CTET CDP Complete in One-Shot |Set 01

CTET एवं सभी शिक्षक भर्ती परीक्षाओ में पूछे जाते है | Child devolpment से बहुविकल्पीय वस्तुनिष्ठ प्रारूप में कुल 30 प्रश्न पूछे जाते हैं। शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसे की – CTET, UPTET, HPTET, PSTET,BPSC TET ,MPTET ,etc में पूछे जाते हैं |बाल विकास के नोट्स जो विभिन्न टीईटी परीक्षा के लिए तैयार हैं जो आपकी बेहतरीन तैयारी के लिए महत्वपूर्ण है | बालविकास के महत्वपुर्ण वन लाइनर प्रश्न उत्तर से आप परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं |

बाल विकास CTET, UPTET, REET, MP TET और अन्य शिक्षण परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है |CTET CDP सिलेबस 2024 में इस खंड Child devolpment से बहुविकल्पीय वस्तुनिष्ठ प्रारूप में कुल 30 प्रश्न पूछे जाते हैं। CTET CDP in One-Shot आपके परीक्षा में लिए काफी महत्वपूर्ण है | आप इस पोस्ट में CTET CDP के महत्वपूर्ण क्वेश्चन और उनके उत्तर को देख पाएंगे | इसलिए CTET CDP Complete in One-Shot इस पोस्ट के माध्यम से पूरा जरुर देखें |

CTET CDP महामैराथन COMPLETE बालविकास

CTET CDP Complete in One-Shot |Set 01

विकास की अवधारणा एवं इसका अधिगम से सम्बन्ध

विकास उन परिवर्तनों की एक प्रगतिशील और व्यवस्थित श्रृंखला है जो एक व्यक्ति के जीवन में घटित होती हैं वह बचपन से बुढ़ापे तक बढ़ती है।

अधिगम के द्वारा एक व्यक्ति अपनी प्रतिक्रियाओं और व्यवहार को बदल देता है ताकि बदलते परिवेश में खुद को समायोजित किया जा सके |

विकास और अधिगम पर्यायवाची नहीं हैं, बल्कि वे दोनों भिन्न हैं |

सोवियत मनोवैज्ञानिक ‘लेव वायगोत्स्की’ ने “सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत” प्रतिपादित किया है और शैक्षिक और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्रों में काम किया |लेव वायगोत्स्की के अनुसार अधिगम एक आवश्यक प्रक्रिया है और विकास के लिए आवश्यक है उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया और एक बच्चे के विकास में समाज और संस्कृति की भूमिका पर जोर दिया। उनका मानना ​​​​था कि सामाजिक शिक्षा संज्ञानात्मक विकास से अग्रिम थी।वायगोत्स्की के अनुसार, अधिगम एक ऐसी प्रक्रिया है जो दैनिक जीवन में कभी भी होती है और यह सिर्फ एक बाहरी घटना नहीं है।

विकास में परिवर्तन मुख्य रूप से गुणात्मक परिवर्तन की विशेषता है, जो केवल मात्रात्मक वृद्धि के बजाय किसी चीज़ की प्रकृति या सार में परिवर्तन पर जोर देता है |

विकास मूर्त से अमूर्त, स्थानिक से वैश्विक और सामान्य से विशिष्ट की तरफ होता है |यह परिवर्तन की एक प्रक्रिया है, और परिवर्तन सदैव रैखिक या प्रत्याशित नहीं होते हैं। इसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और पर्यावरण सहित जीवन के कई भिन्न-भिन्न पहलू शामिल हैं।

विकास की प्रक्रिया में बालक का शारीरिक (Physical), क्रियात्मक (Motor), संज्ञानात्मक (Cognitive) भाषागत् (Language), संवेगात्मक (Emotional) एवं सामाजिक (Social) विकास होता है |

विकास बहु-आयामी (Multi-dimensional) होता है अर्थात् कुछ क्षेत्रों में यह बहुत तीव्र वृद्धि को दर्शाता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में धीमी गति से होता है |एक अच्छा परिवेश शारीरिक शक्ति अथवा स्मृति और बुद्धि के स्तर में अनापेक्षित सुधार ला सकता है।

किशोरावस्था के दौरान शरीर के साथ-साथ संवेगात्मक, सामाजिक और संज्ञानात्मक क्रियात्मकता में भी तेजी से परिवर्तन दिखाई देते हैं।

विकासात्मक परिवर्तनों की दर आनुवंशिक घटकों अथवा परिवेशीय प्रभावों के कारण अलग हो सकते है | कुछ बच्चे अपनी आयु की तुलना में अत्यधिक पूर्व-चेतन (जागरूक) हो सकते हैं, जबकि कुछ बच्चों में विकास की गति बहुत धीमी होती है। उदाहरणस्वरूप, यद्यपि एक औसत बच्चा 3 शब्दों के वाक्य 3 वर्ष की आयु में बोलना शुरू कर देता है, परन्तु कुछ ऐसे बच्चे भी हो सकते हैं, जो 2 वर्ष के होने से बहुत पहले ही ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं।

शारीरिक विकास शरीर के बाह्य परिवर्तन जैसे-ऊँचाई, शारीरिक अनुपात में वृद्धि इत्यादि जिन्हें स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, किन्तु शरीर के आन्तरिक अवयवों के परिवर्तन बाह्य रूप से दिखाई तो नहीं पड़ते, किन्तु शरीर के भीतर इनका समुचित विकास होता रहता है।

मानसिक विकास संज्ञानात्मक या मानसिक विकास (Cognitive or Mental Development) से तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं एवं क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है, जिनके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों का पर्याप्त उपयोग कर पाता है।

कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, समस्या समाधान करना, निर्णय लेना इत्यादि की योग्यता संज्ञानात्मक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होते हैं।

बालक का संवेगात्मक व्यवहार उसकी शारीरिक वृद्धि एवं विकास को ही नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास को भी प्रभावित करता है।

वृद्धि (Growth) बालकों की शारीरिक संरचना का विकास जिसके अन्तर्गत लम्बाई, भार, मोटाई तथा अन्य अंगों का विकास आता है।

वृद्धि आन्तरिक एवं बाह्य दोनों रूपों में होती है, यह एक निश्चित आयु तक होती है तथा भौतिक पहलू (Physical Aspect) में ही सम्भव है |वृद्धि की क्रिया आजीवन नहीं होती है जब बालक परिपक्व होने के साथ यह वृद्धि की प्रक्रिया रुक जाती है परंतु विकास एक सतत प्रक्रिया है और बालक के परिपक्व होने के बाद यह चलती रहती है |

बौद्धिक विकास जितना उच्चतर होगा, हमारे अन्दर समझदारी, नैतिकता, भावनात्मकता, तर्कशीलता इत्यादि का विकास उतना ही उत्तम होगा। वंशानुगत (Heredity) स्थितिं शारीरिक एवं मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शारीरिक विकास के लिए सूर्य के प्रकाश की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि सूर्य के प्रकाश में विटामिन-डी की प्राप्ति होती है |

जन्म से 2 वर्ष तक बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास तेजी से होता है।

बाल्यकाल (Childhood) के पूर्व बाल्यकाल में 2 से 6 वर्ष की अवस्था में बालको का बाहरी जुड़ाव होने लगता हैं। बच्चों में (नकल करने की प्रवृत्ति) अनुकरण एवं दोहराने की प्रवृत्ति पाई जाती है। समाजीकरण एवं जिज्ञासा दोनों में वृद्धि होती है।

बाल्यकाल (Childhood) के उत्तर बाल्यकाल में सामान्यतया 6 से 12 वर्ष तक की अवस्था में बच्चों में बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक, तर्कशीलता इत्यादि का व्यापक विकास होता है।

किशोरावस्था में 12 से 18 वर्ष के बीच की अवस्था अत्यन्त जटिल अवस्था तथा साथ ही व्यक्ति के शारीरिक संरचना में परिवर्तन देखने को मिलता है।बालक बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर उन्मुख होता है।12-14 वर्ष की आयु के बीच लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की लम्बाई एवं माँसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है एवं 14-18 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की लम्बाई एवं माँसपेशियों तेजी से बढ़ती है।

यह कहा जाता है कि विकास एक निश्चित स्वरूप का अनुसरण करता है। एक बच्चा सबसे पहले अपने सिर पर, फिर हाथों पर और अंत में पैरों को पर नियंत्रण पाना शुरू करता है। विकास की किस अवधारणा को इसके द्वारा संदर्भित किया जाता है?

उत्तर :-शीर्षाभिमुख विकास

विकास के सिद्धांत मानव विकास की मूल प्रक्रिया को परिभाषित करते हैं |

शीर्षाभिमुख​ अनुक्रम – मस्तकोधमुखी​ अनुक्रम​ सिर से पैर तक अनुक्रम को संदर्भित करता है | इस सिद्धांत के अनुसार, बच्चा पहले सिर पर नियंत्रण प्राप्त करता है, फिर भुजाओं पर और उसके बाद पैरों पर नियंत्रण प्राप्त करता है। शिशु का मस्तिष्क और सिर तेजी से बढ़ते हैं और आंत के अंगों की तुलना में पहले परिपक्वता तक पहुंचते हैं।

समीप-दूराभिमुख अनुक्रम शरीर के बाहरी हिस्से की तुलना में शरीर का मध्य भाग तेजी से विकसित होता है। पहले पूरे हाथ या पैर की गति देखी जाती है, फिर कोहनी और घुटने के जोड़ पर नियंत्रण, और अंत में उंगलियों के विशेष पहुंच वाली गतिविधियों को देखा जाता है।

मानव विकास के सिधांत

निरंतरता का सिद्धांत गर्भाधान से शुरू होता है और मृत्यु पर समाप्त होता है।

व्यक्ति भिन्नता का सिद्धांत वंशानुगत लक्षणों और पर्यावरण में अंतर को दर्शाता है।

अनुक्रमिकता का सिद्धांत मस्तकोधमुखी​ प्रवृत्ति – सिर से पैर तक अनुदैर्ध्य रूप से विकसित होना और समीपस्थ प्रवृत्ति – केंद्र से चरम से सीमा तक विकसित होना दर्शाता है |

सामान्यता से विशिष्टता का सिद्धांत सामान्य प्रतिक्रियाओं से लेकर विशिष्ट व्यवहार प्रदर्शित करने तक

अंतर्संबंध का सिद्धांत शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावात्मक, सामाजिक और नैतिक पहलुओं के संतुलित अंतर्संबंध के माध्यम से विकास करना

विभेदीकरण दर का सिद्धांत में व्यक्ति अपने विकास की दर में भिन्न हैं। उदाहरण के लिए, विकास के प्रारंभिक चरण में लड़कियां लड़कों की तुलना में तेजी से बढ़ती हैं। यह एक रैखिक प्रक्रिया का पालन नहीं करता है।

विकास ________?

विकास मनुष्यों के पूरे जीवन काल गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक होता है |विकास केंद्र से बाहरी दिशा की ओर होता है। विकास के क्रम और दिशा को बनाए रखने के लिए शीर्षाभिमुख और समीपदूराभिमुख प्रवृत्तियों का पालन किया जाता है |

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