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CTET CDP one liner in hindi

Child Development and Pedagogy One Liner Questions for CTET :- केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा का आयोजन साल में दो बार किया जाता है आप इस परीक्षा में सफल होकर देश के किसी भी राज्य में शिक्षा बनने के पात्र माने जाते है | बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र  से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न का अध्ययन करेंगे | बाल विकास शिक्षा शास्त्र के प्रश्न केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा सीटेट आयोजित की जाती है | आज हम इस पोस्ट के माध्यम से बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को देखेंगे जो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित पात्रता परीक्षा में के लिए अति महत्वपूर्ण है।

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शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसे की – CTET, UPTET, HPTET, PSTET,BPSC TET ,MPTET ,etc में इससे सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं | यदि आप भी टीईटी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं तो इन प्रश्नों को जरुर पढ़े | अगर आप भी शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी करते हैं तो इस Ctet cdp important questions को पूरा जरुर पढ़ें | इस पोस्ट में आपको Child Development & Pedagogy के महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दिए जा रहे जिसे आप पढ़ परीक्षा में अच्छे मार्क ला सकते हैं | इसलिए CTET CDP one liner in hindi इस पोस्ट के माध्यम से पूरा जरुर देखें |

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Child Development And Pedagogy Important Questions

  • शिक्षक का कर्तव्य है कि वह छात्रों को बौद्धिक, सामाजिक, शारीरिक, भावनात्मक और नैतिक रूप से विकसित करने में मदद करे ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके |
  • शिक्षक के दायित्व यह भी है यदि कुछ निर्धन छात्र आपसे अतिरिक्त समय में पढ़ना चाहते हैं, तो आप आवश्यकतानुसार समय-समय पर उनकी कठिनाईयों को पूरा करेंगे।
  • लेव व्यागोत्सकी के अनुसार ‘अध्यापन और मूल्याँकन’ के लिए ‘समीपस्थ विकास क्षेत्र’ का इस्तेमाल करना चाहिए। वायगोत्सकी के अनुसार संज्ञानात्मक विकास एक अंतवैयक्तिक सामाजिक परिस्थिति में सम्पन्न होता है। जिसमें बालकों को अपने वास्तविक विकास के स्तर अर्थात जहाँ वे बिना किसी मदद के स्वयं कोई कार्य कर सकते हैं, से अलग उनके संभाव्य विकास के स्तर (अर्थात जहाँ वे किसी की सहायता प्राप्त कर कोई कार्य कर सकते हैं) की ओर से ले जाने का प्रयास किया जाता है।
  • वायगोत्स्की ने अपने सिद्धांत में ‘समीपस्थ विकास के क्षेत्र (ZPD)’ की अवधारणा का प्रस्ताव दिया है, जो एक शिक्षार्थी अपने दम पर क्या कर सकता है और वह किसी की मदद से क्या कर सकता है, के बीच के अंतर को दर्शाता है। यह किसी के मार्गदर्शन में शिक्षार्थी के वास्तविक विकास स्तर और उसके विकास के स्तर के बीच की दूरी है।इन दोनों के बीच के अंतर को वायगोत्सकी में समीपस्थ विकास का क्षेत्र (Zone of Proximal Development or ZPD) कहा है।
  • वायगोत्सकी ने भाषा विकास की निम्न अवस्था बताए हैं- (i) सहज अवस्था (ii) अहं केंद्रित अवस्था (iii) आंतरिक भाषण
  • एक अध्यापिका एक विशिष्ट संप्रत्यय को पढ़ाने हेतु बच्चे को आधा हल किया हुआ उदाहरण देती है।
  • लेव व्यागोत्सकी के अनुसार अध्यापिका ‘पाड़’ रणनीति का इस्तेमाल कर रही है।
  • पाड़ बच्चे की क्षमता को बढ़ाने के लिए बच्चों को संकेत देना तथा आवश्यकाता पड़ने पर सहयोग प्रदान करने को कहते हैं।
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  • स्कैफल्डिंग (पाड़) एक प्रकार की शिक्षण प्रक्रिया है, जिसमें बच्चों को दिये जाने वाले निर्देश की मात्रा तथा स्वरूप उनके विकास के स्तर के अनुरूप होता है।
  • नए कौशल को सीखने में स्कैफाल्डिंग या ढ़ांचा निर्माण का यह तरीका काफी कारगर है।
  • एक प्रगतिशील कक्षीय माहौल के अनुसार निम्न अभिवृति जैसे—कि निर्णय निर्धारण में बच्चों की सहभागिता, भय-मुक्त अधिगम वातावरण की संरचना तथा विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान रखना सभी आते हैं।
  • प्रगतिशील शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य बालक की योग्यताओं का विकास करना है।
  • प्रगतिशील शिक्षा के विकास में जॉन डीवी का विशेष योगदान है।
  • प्रगतिशील शिक्षा यह बताती है कि शिक्षा से बालक के लिए है, बालक शिक्षा के लिए नहीं।
  • प्रगतिशील शिक्षा की विशेषताएँ-
    • (i) बालक को स्वयं करके सीखने पर बल देना चाहिए
    • (ii) बालक को स्वयं कार्यक्रम बनाने का मौका देना चाहिए।
    • (iii) समस्या समाधान और महत्त्वपूर्ण सोच पर जोर देना चाहिए
    • (iv) रत्न विद्या का विरोध आदि।
  • कोई अध्यापक बच्चों को, बुद्धि-लब्धि के आधार पर स्थित समूहों में पृथक ना करें, क्योंकि बुद्धि-लब्धि संकल्पना स्थायी नहीं है और यह बच्चों को चिह्नित करने के लिए जिम्मेदार हो सकती है।
  • बुद्धि लब्धि बुद्धि मापने का एक तरीका है।
  • बुद्धि लब्धि द्वारा किसी इंसान की बुद्धि को परिभाषित किया जा सकता है कि वो किस बुद्धि का है।
  • बुद्धि लब्धि के सूत्र का आविष्कार टर्मन ने किया। हालांकि सबसे पहले बुद्धि लब्धि का सूत्र स्टर्न ने दिया था।
  • किसी व्यक्ति की बुद्धि लब्धि मानसिक आयु / वास्तविक आयु × 100 के सूत्र द्वारा दिया जाता है
  • यदि 10 वर्ष की आयु के व्यक्ति की मानसिक आयु 10 वर्ष है, तो उसकी बुद्धि लब्धि 100 होगी।
  • मानसिक आयु बुद्धि लब्धि = वास्तविक आयु बुद्धि पहचानने तथा सीखने की शक्ति है—बिनेट का
  • हावर्ड गार्डनर के सिद्धान्त के अनुसार, एक कक्षा में तरह-तरह की अध्यापन रणनीतियों का इस्तेमाल होना जरूरी है, क्योंकि यह बहु-बौद्धिकता को निष्पादित करने में मददगार है।
  • बहुबुद्धि सिद्धान्त के प्रतिपादक सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक गार्डनर है। उन्होंने 1983 ई. में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  • हावर्ड गार्डनर, एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक ने बहु-बुद्धि के सिद्धांत का प्रस्ताव दिया। अपनी पुस्तक ‘फ्रेम्स ऑफ माइंड’ में, उन्होंने बताया कि वे नहीं मानते कि “संज्ञान का एक ही रूप है जो सभी मानवीय चिंतन में सहायक है। 
  • बहुबुद्धि सिद्धान्त के अनुसार अब सामान्य बुद्धि में नौ तरह की क्षमताएँ था बुद्धि सम्मिलित होती है। इन नौ प्रकार की बुद्धि का विशेष गुण यह है कि प्रत्येक बुद्धि एक दूसरे से स्वतंत्र होती है।
  • स्थानिक बुद्धि स्थानिक और दृश्य जानकारी को प्रभावी ढंग से देखने, समझने और उपयोग करने की क्षमता है।
  • गार्डनर के अनुसार, बौद्धिकता IQ से कहीं अधिक होती है, क्योंकि उत्पादकता के अभाव में उच्च IQ बौद्धिकता के बराबर नहीं होता।
  • कक्षा में विभिन्न प्रकार की शिक्षण विधियों, रणनीतियों का होना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह बहु-बौद्धिकता का प्रयोग करने में मदद करता है।
  • 1.5 से 2.5 साल की उम्र के बच्चों द्वारा अक्सर उच्चारित ‘द्वि- शब्दीय’ उच्चारणों को तार प्रेषित वाचन कहा जाता है।
  • तार प्रेषित वाचन का प्रयोग 1.5 से 2.5 साल तक के बच्चों में अधिक होता है, क्योंकि इस उम्र में बच्चे तार भेजने जैसे शब्द अर्थात एक या दो शब्दों का उच्चारण ही कर पाते हैं। जैसे—सोजा, मम्मी आओ या पापा जा । ये शब्दों के सरलतम रूप खंड होते हैं, जो बच्चों के इच्छा और जरूरतों को स्पष्ट रूप से बताता है।
  • तार प्रेषित वाचन में बच्चे एकल तथा द्विशब्दों के मेल से छोटे-छोटे वाक्य खंड का उपयोग करते हैं।
  • बच्चे अपने समाज के बारे में ज्ञान, रहने के कौशल, मूल्य, रीतियाँ आदि अपने (i) आस-पड़ोस (ii) धर्म (iii) स्कूल तथा (iv) समकक्षीय समूह से सीखते हैं। जब बालक सामाजिक प्रत्याशाओं तथा सामाजिक मानकों के अनुरूप व्यवहार करना सीख लेता है, तो इसे सामाजीकरण की संज्ञा दी जाती है।
  • विद्यालय तथा पास-पड़ोस सामाजीकरण के गौण वाहक हो सकते हैं।
  • जीन पियाजे के सिद्धांतों के अनुसार अनुकूलन समायोजन व समावेशन जैसी दो मूल प्रक्रिया को समाहित करता है।
  • जीन पियाजे के अनुसार बच्चों में संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के प्रमुख संप्रत्यय निम्न है—
    • (i) अनुकूलन
    • (ii) साम्यधारण
    • (iii) सरंक्षण
    • (iv) संज्ञानात्मक संरचना
    • (v) मानसिक संक्रिया
    • (vi) स्कीम्स (vii) स्कीमा
    • (viii) विकेंद्रण तथा
    • (ix) पारस्परिक क्रिया
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  • अनूकूलन की प्रवृत्ति बालक में जन्मजात होती है। अनुकूलन का अर्थ है— वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना । ये दो तरीके से होते हैं— (i) आत्मसातीकरण तथा (ii) समायोजन
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 पाठ्यचर्या में लचीलापन होना चाहिए। ताकि शिक्षार्थियों को उनके सीखने के प्रक्षेपवक्र और कार्यक्रमों को चुनने की क्षमता हो और इस तरह वे अपनी प्रतिभा और रूचियों के अनुसार जीवन में अपना रास्ता चुन सकें।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लचीला बहु-स्तरीय गति आधारित अधिगम पर बल देती है।
  • बालक जो कुछ भी सीखता है या अधिगम करता है उसकी जाँच आवश्यक है, जिससे बालक के क्षमता, योग्यता के साथ उन्नति का पता चलता है। बालक की शिक्षा में मूल्यांकन व मापन दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
    • मूल्यांकन उद्देश्य आधारित होता है
    • मापन उद्देश्य आधारित हो भी सकता है, नहीं भी
  • यशपाल समिति का प्रोफेसर यश पाल की अध्यक्षता में 1992 को गठन किया गया था | जिसमे बोझ के बिना अधिगम’ शीर्षक वाली रिपोर्ट के लिए जाना जाता है |
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005, NCERT द्वारा प्रकाशित, भारतीय स्कूलों के साथ-साथ शिक्षक शिक्षा को पुनः जीवंत करने के लिए एक संपूर्ण दस्तावेज है |
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 में यह सुनिश्चित किया गया है कि अधिगम को रटन विधियों से दूर कर दिया गया है, यह पाठ्यचर्या को समृद्ध करते हैं ताकि यह पाठ्यपुस्तकों से परे निकल जाए, और परीक्षाओं को अधिक लचीला बनाने और उन्हें कक्षा के जीवन के साथ एकीकृत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
  • भाषा – स्कूल के विषयों और संकायों में बोलने और सुनने, पढ़ने और लिखने जैसे भाषा के कौशल का अभ्यास करने की आवश्यकता ही भाषा है |
  • गणित – माध्यमिक स्तर पर, छात्र गणित की संरचना को एक विद्या विषय के रूप में समझना शुरू कर देते हैं।
  • विज्ञान – विषयवस्तु और प्रक्रिया के साथ-साथ विज्ञान शिक्षण की भाषा को शिक्षार्थियों की आयु और संज्ञानात्मक क्षमताओं के अनुरूप होना चाहिए।
  • सामाजिक विज्ञान – इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान अधिगम के लिए एक अंतःविषय उपागम पर ध्यान केंद्रित करना और प्रमुख राष्ट्रीय चिंताओं जैसे कि लिंग, न्याय, मानवाधिकार, और हाशिए के समूहों और अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशीलता का संचालन करना।
  • कार्य स्कूल पाठ्यचर्या – पूर्व-प्राथमिक स्तर से वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक पुनर्निर्माण की आवश्यकता है ताकि ज्ञान प्राप्ति, मूल्यों के विकास और बहु ​​कौशल निर्माण में शैक्षणिक माध्यम के रूप में कार्य की शैक्षणिक क्षमता को महसूस किया जा सके।
  • कला शिक्षा – संगीत और नृत्य के लोक और शास्त्रीय रूपों, दृश्य कला, कठपुतली, मिट्टी का काम (क्ले वर्क), रंगमंच कला और विरासत शिल्प को स्कूल की पाठ्यचर्या के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
  • शांति शिक्षा – प्रासंगिक गतिविधियों की मदद से पूरे स्कूल के वर्षों में सभी विषयों में शांति-उन्मुख मूल्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। शांति शिक्षा को शिक्षक शिक्षा का एक घटक बनाना चाहिए।
  • योग, स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा – यह शिक्षार्थियों के समग्र विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा कार्यक्रमों (योग सहित) के माध्यम से नामांकन, प्रतिधारण और स्कूल के पूरा होने के मुद्दों का सफलतापूर्वक संचालन करना संभव हो सकता है।
  • शिक्षक ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनके पास शिक्षण और सीखने की समस्याओं को समझने के लिए और तर्क देने की क्षमता हो|
  • शिक्षको के गुण:- गर्मजोशी और उत्साह,अपने विषय ज्ञान में दृढ़ता से निहित हैं वे स्पष्ट प्रस्तुतीकरण करते हैं,शिक्षण कार्य को प्रभावी ढंग से व्यवस्थित करते हैं, अवधारणाओं और सामग्री को व्यवस्थित करने में सहायक होते है |
  • ‘अभिसारी सोच’ सृजनात्मक विद्यार्थी की पहचान संबंधी विशेषता नहीं है। अभिसारी सोच वाले विद्यार्थी को सोच संकुचित होता है।
  • अभिसारी चिंतन एक बिंदू पर केन्द्रित होता है। यह बुद्धि को बढ़ावा नहीं देता है।
  •  कोह्लबर्ग का मानना था कि नैतिक विकास में इन अवस्थाओं का क्रम निश्चित होता है।
  • कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिक विकास की तीन चरण है-
    • (i) पूर्व परंपरागत स्तर
    • (ii) परंपरागत स्तर तथा
    • (iii) उत्तर परंपरागत स्तर
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  • अधिगम अक्षमता का तात्पर्य सीखने की क्षमता अथवा योग्यता की कमी या अनुपस्थिति से है। सीखने में कठिनाईयों को समझने के लिए हमें एक बच्चे की सीखने की क्रिया को प्रभावित करने वाले कारकों का आकलन करना चाहिए।
  • अधिगम अक्षमता का वर्गीकरण
    • डिस्लेक्सिया (पढ़ने संबंधी विकार)
    • डिस्ग्राफिया (लेखन संबंधी विकार)
    • डिस्कैलकूलिया (गणितीय कौशल संबंधी विकार)
    • डिस्फैसिया (वाक् क्षमता संबंधी विकार)
    • डिस्प्रैक्सिया (लेखन एवं चित्रांकन संबंधी विकार)
    • डिसऑर्थोग्राफ़िय (वर्तनी संबंधी विकार)
    • ऑडीटरी प्रोसेसिंग डिसआर्डर (श्रवण संबंधी विकार)
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